Saturday, October 31, 2020

वल्लभभाई पटेल जी

 


वल्लभभाई झावेरभाई पटेल जो सरदार पटेल के नाम से लोकप्रिय थे, एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वे एक भारतीय अधिवक्ता और राजनेता थे, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और भारतीय गणराज्य के संस्थापक पिता थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई और एक एकीकृत, स्वतंत्र राष्ट्र में अपने एकीकरण का मार्गदर्शन किया। भारत और अन्य जगहों पर, उन्हें अक्सर हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में सरदार कहा जाता था, जिसका अर्थ है "प्रमुख"। उन्होंने भारत के राजनीतिक एकीकरण और 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान गृह मंत्री के रूप में कार्य किया।

पटेल का जन्म नडियाद, गुजरात में हुआ था। वे झवेरभाई पटेल एवं लाडबा देवी की चौथी संतान थे। सोमाभाई, नरसीभाई और विट्टलभाई उनके अग्रज थे। उनकी शिक्षा मुख्यतः स्वाध्याय से ही हुई। लन्दन जाकर उन्होंने बैरिस्टर की पढाई की और वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया।

स्वतंत्रता के समय भारत में 562 देसी रियासतें थीं। इनका क्षेत्रफल भारत का 40 प्रतिशत था। सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही वीपी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल जम्मू एवं कश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद स्टेट के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ सौराष्ट्र के पास एक छोटी रियासत थी और चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी थी। वह पाकिस्तान के समीप नहीं थी। वहाँ के नवाब ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। राज्य की सर्वाधिक जनता हिंदू थी और भारत विलय चाहती थी। नवाब के विरुद्ध बहुत विरोध हुआ तो भारतीय सेना जूनागढ़ में प्रवेश कर गयी। नवाब भागकर पाकिस्तान चला गया और 9 नवम्बर 1947 को जूनागढ भी भारत में मिल गया। फरवरी 1948 में वहाँ जनमत संग्रह कराया गया, जो भारत में विलय के पक्ष में रहा। हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी रियासत थी, जो चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी थी। वहाँ के निजाम ने पाकिस्तान के प्रोत्साहन से स्वतंत्र राज्य का दावा किया और अपनी सेना बढ़ाने लगा। वह ढेर सारे हथियार आयात करता रहा। पटेल चिंतित हो उठे। अन्ततः भारतीय सेना 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद में प्रवेश कर गयी। तीन दिनों के बाद निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया और नवंबर 1948 में भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अन्तरराष्ट्रीय समस्या है। कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले गये और अलगाववादी ताकतों के कारण कश्मीर की समस्या दिनोदिन बढ़ती गयी। 5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री मोदीजी और गृहमंत्री अमित शाह जी के प्रयास से कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 और 35(अ) समाप्त हुआ। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया और सरदार पटेल का भारत को अखण्ड बनाने का स्वप्न साकार हुआ। 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख के रूप में दो केन्द्र शासित प्रेदश अस्तित्व में आये। अब जम्मू-कश्मीर केन्द्र के अधीन रहेगा और भारत के सभी कानून वहाँ लागू होंगे। पटेल जी को कृतज्ञ राष्ट्र की यह सच्ची श्रद्धांजलि है। 

वल्लभभाई पटेल जी की जयंती पर जन हितकारी संगठन उन्हे कोटि कोटि नमन करता है।

Tuesday, October 27, 2020

जतिंद्र नाथ दास जी


जतिन्द्र नाथ दास स्वतंत्रता से पहले अनशन(उपवास) से शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए जेल में अपने प्राण त्याग दिए और शहादत पाई। इन्हें 'जतिन दास' के नाम से भी जाना जाता है, जबकि संगी साथी इन्हें प्यार से 'जतिन दा' कहा करते थे।जतिन दास का नाम देश के बड़े अनशन सत्याग्रही के रूप में लिया जाता है| लाहौर जेल में 63 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहने के बाद जतिन दास की मौत के सदमे ने पूरे देश को हिला दिया था|

जतिन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), में हुआ था। उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था। जतिन्द्रनाथजब नौ वर्ष के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। 16 वर्ष की उम्र में 1920 में जतिन दास ने मैट्रिक की परीक्षा पास की।जब जतिन्द्रनाथअपनी आगे की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे तभी वे बंगाल में एक क्रान्तिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति’ में शामिल हो गये|

युवावस्था से ही उनके अन्दर देश को अंग्रेजों से आज़ाद कराने की आग धधक रही थी| उन्होंने 1921 में असहयोग आन्दोलन में भाग लिया| विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए वे गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें 6 महीने की सज़ा हुई। लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो निराश जतिन्द्रनाथफिर कॉलेज में भर्ती हो गए। कॉलेज का यह प्रवेश जतिन्द्रनाथके जीवन में निर्णायक सिद्ध हुआ।

एक युवा क्रान्तिकारी के माध्यम से जतिन्द्रनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सचिंद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संस्था 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गये। अपने सम्पर्कों और साहसपूर्ण कार्यों से उन्होंने दल में महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया और अनेक क्रान्तिकारी कार्यों में भाग लिया।

नवम्बर 1925 में जतिन्द्रनाथ को 'दक्षिणेश्वर बम कांड' और 'काकोरी कांड' के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया, किन्तु प्रमाणों के अभाव में मुकदमा न चल पाने पर वे नज़रबन्द कर लिये गए। जेल में जतिन्द्रनाथने कैदियों पर हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठायी और भूख हड़ताल पर चले गये|जतिन्द्रनाथकी भूख हड़ताल का जेल प्रशासन पर इतना प्रभाव पड़ा कि जेल अधीक्षक ने 20 दिनों के बाद ही माफ़ी मांगी तो ही जतिन्द्रनाथने अपना अनशन समाप्त किया और जेल अधीक्षक को उन्हें रिहा करना पड़ा। यह जतिन्द्रनाथ की दृढ़ इच्छा शक्ति की जीत थी|

जेल से बाहर आने पर जतिन्द्रनाथ ने अपना अध्ययन और क्रान्तिकारी गतिविधियों दोनों को जारी रखा। 1928 की 'कोलकाता कांग्रेस' में वे 'कांग्रेस सेवादल' में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक थे। वहीं उनकी भगत सिंह से भेंट हुई और उनके अनुरोध पर बम बनाने के लिए आगराआ गए। 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके, वे इन्हीं के द्वारा बनाये हुए थे। 14 जून,1929 को जतिन्द्रनाथ को क्रान्तिकारी गतिविधियोंके लिये गिरफ़्तार कर लाहौर जेल में कैद कर लिया गया और उन पर 'लाहौर षड़यंत्र केस' के तहत मुकदमा चला।

 लाहौर जेल में जतिन्द्रनाथ ने अन्य क्रान्तिकारी साथियों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी| उन्होंने भारतीय कैदियों और विचाराधीन कैदियों के लिए समानता की मांग की| भारतीय कैदियों के लिए वहां सब दुखदायी था| जेल प्रशासन द्वारा उपलब्ध करायी गई वर्दियां कई-कई दिनों तक नहीं धुलती थी| रसोई क्षेत्र और भोजन चूहों और तिलचट्टों से भरा रहता था| कोई भी पठनीय सामग्री जैसे अखबार या लिखने के लिए कोई कागज इत्यादि नहीं दिया जाता था जबकि एक ही जेल में अंग्रेज कैदियों को सारी सुविधायें मिल रही थी|

जेल में जतिन्द्रनाथ की भूख हड़ताल अवैध नजरबंदियों के खिलाफ प्रतिरोध में एक महत्वपूर्ण कदम था| उनकाकहना था कि एक बार अनशन आरम्भ होने पर हम अपनी मांगों की पूर्ति के बिना उसे नहीं तोड़ेंगे। कुछ समय के बाद जेल अधिकारियों ने नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों को जबरन कुछ खिलाने की कोशिश की, उन्हें मारा-पीटा गया|जतिन्द्रनाथ को 20दिन के पहले अपने अनशन का अनुभव था। उनके साथ यह युक्ति काम नहीं आई। नाक से डाली नली को सांस से खींचकर वे दांतों से दबा लेते थे।

अन्त में पागल खाने के एक डॉक्टर ने एक नाक की नली दांतों से दब जाने पर दूसरी नाक से नली डाल दी, जो जतिन्द्रनाथ के फेफड़ों में चली गई। उनकी घुटती सांस से और लगातार 63 दिनों से कुछ नहीं खाने के कारण जतिन्द्रनाथको निमोनिया हो गया। कर्मचारियों ने उन्हें धोखे से बाहर ले जाना चाहा, लेकिन जतिन्द्रनाथ अपने साथियों से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए।उनकी यह यादगार भूख हड़ताल 13 जुलाई 1929 को शुरू हुई और 63 दिनों तक चली| जतिन्द्रनाथ 13 सितम्बर 1929 को मात्र 24 वर्ष की उम्र में ही शहीद हो गये और उनकी भूख हड़ताल (अनशन) अटूट रही|

दुर्गा भाभी ने अंतिम संस्कार के लिए उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कोलकता ले जाने की तयारी की और उनके पार्थिव शरीर को रेल द्वारा लाहौर से कोलकता ले जाया गया| उस सच्चे शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हजारों लोग रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों पर एकत्रित होकर सच्ची श्रद्धांजलि दे रहे थे| उनके अंतिम संस्कार के समय कोलकता में दो मील लम्बा जुलूस उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए खड़ा था|देश के बड़े अनशन सत्याग्रहीशहीद शिरोमणि जतिन्द्रनाथ दास के देश प्रेम और अनशन की पीड़ा का कोई सानी नहीं है| वह आज भी हमारे प्रेरणा स्त्रोत हैं|

जतिन्द्रनाथ दास जी की जयंती पर जन हितकारी संगठन उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻


जय भारत

 

Wednesday, October 7, 2020

दुर्गावती देवी (दुर्गा भाभी)



महिला क्रांतिकारी दुर्गावती देवी (दुर्गा भाभी)
जयंती : 7 अक्टूबर 1907

              दुर्गावती देवी जिन्हें हम दुर्गा भाभी के नाम से जानते है भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को शहजादपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था | दुर्गावती देवी का विवाह क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा से हुआ था। नेशनल कालेज-लाहौर के विद्यार्थी भगवतीचरण क्रांतिभाव से भरे हुए थे ही, उनकी पत्नी दुर्गावती देवी भी आस-पास के क्रांतिकारी वातावरण के कारण उसी में रम गईं थी। 1925 में उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम शचीन्द्रनाथ रखा गया। जन-जागृति और शिक्षा के महत्व को समझने वाली दुर्गावती देवी ने खादी अपनाते हुए अपनी पढाई जारी रखी |

            भगवती चरण बोहरा राय साहब के पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‍‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को चालीस हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया।

            दुर्गा भाभी ने सन् 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता की। साण्डर्स वध के पश्चात् सुखदेव दुर्गा भाभी के पास आये। सुखदेव ने दुर्गा भाभी से 500 सौ रूपये की आर्थिक मदद ली तथा उनसे प्रश्न किया- आपको पार्टी के काम से एक आदमी के साथ जाना है, क्या आप जायेंगी? प्रत्युत्तर में हाँ मिला। सुखदेव ने कहा- आपके साथ छोटा बच्चा शची (शचीन्द्रनाथ) होगा, गोली भी चल सकती है। दुर्गा स्वरूप रूप धर दुर्गा भाभी ने कहा- “सुखदेव, मेरी परीक्षा मत लो। मैं केवल क्रान्तिकारी की पत्नी ही नहीं हूँ, मैं खुद भी क्रान्तिकारी हूँ। अब मेरे या मेरे बच्चे के प्राण क्रान्तिपथ पर जायें, मैं तैयार हूँ|"

            दूसरे दिन 18 दिसम्बर 1928 को सुखदेव अंग्रेज़ अफ़सर साण्डर्स को मारने वाले भगत सिंह और राजगुरू को लेकर दुर्गा भाभी के घर आ गये। भगत सिंह ने (फैल्ट हैट ओढ़े, पतलून और ऊपर बढ़िया ओवरकोट, पैर में चमकते हुए काले बूट जूते पहने छ: फुटा गोरा-चिट्टा पंजाबी जवान, जो उच्च अधिकारी लग रहा था) शची को गोद में लिया, शची के कारण भगत सिंह का चेहरा छिपा था, पीछे दुर्गा भाभी बड़ी रूआब से ऊँची हील की सैण्डिल पहने, पर्स लटकाये तथा राजगुरू नौकर रूप में पीछे-पीछे स्टेशन पहुंचे। जो एक पुरानी-फटी दरी को लपेटकर साथ लिए थे, उनका सिर मुँडा हुआ था और शरीर पर पुराने कपड़े थे| भगत सिंह और दुर्गा भाभी कलकता मेल के प्रथम श्रेणी में तथा राजगुरू तृतीय श्रेणी के डिब्बे में चढ़ गये।

            इस प्रकार भगत सिंह और राजगुरू को सकुशल लाहौर से निकालने का श्रेय दुर्गा भाभी को है कि किस चतुराई से पुलिस की आँखों में धूल झोंकर निकाल लाई थी, यह आजादी की लड़ाई के इतिहास का अनछुआ पृष्ठ है। कलकता पहुचने पर भगवतीचरण ने अपनी क्रान्तिकारी पत्नी दुर्गा की प्रशंसा की और उनके साथ विवाह-बन्धन में बँध जाने के लिए स्वयं को सराहा, वे दुर्गा की निर्भयता और देश के प्रति समर्पण-भाव पर मुग्ध हो गए थे। धन्य हैं ये वीरांगना। इनके अतिरिक्त भेष बदल बदल कर बम, पिस्तौल क्रांतिकारियों को दुर्गा भाभी अक्सर मुहैया कराती रहती थीं।

            दुर्गा भाभी अपने पति बोहरा के साथ मिलकर क्रांतिकारियों की हर तरह से मदद करती थीं। मात्र 23 वर्ष की अवस्था में पति के शहीद हो जाने के बाद भी दुर्गा भाभी के साहस में कोई कमी नहीं आई। दुर्गा भाभी मृत्यु की सूचना का वज्रपात सहते हुए, अन्तिम दर्शन भी न कर पाने का दंश झेलते हुए भी धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति बनी रहीं। पति की मृत्योपरान्त उनको श्रद्धांजलि रूपेण वे दोगुने वेग से क्रांति कार्य को प्रेरित करने लगी। भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने को जाने लगे तो वीरांगना दुर्गा भाभी ने अपने बाह से खून निकाल कर तिलक लगाया और तब उन्हें विदा किया था।

          दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। 9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने तत्कालीन बम्बई गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई।

           समृद्ध परिवार की दुर्गा भाभी के लाहौर के तीनों घर तथा इलाहाबाद के दोनो घर जब्त हो चुके थे। पुलिस पीछे पडी थी। इस केस में उनके विरुद्ध वारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज़्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गयीं| 15 दिन के रिमाण्ड के पश्चात सबूतों के अभाव में दुर्गा भाभी को पुलिस को रिहा करना पड़ा। 1919 रेग्यूलेशन ऐक्ट के तहत तत्काल दुर्गा भाभी को कैद कर तीन वर्ष तक नजरबंद रखा गया और फिर लाहौर और दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई।

            तीन वर्ष बाद पाबंदी हटने पर दुर्गा भाभी ने प्यारेलाल गल्र्स स्कूल-गाजियाबाद में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान क्षय रोग हो गया परन्तु दुर्गा भाभी समाज-सेवा करते हुए कांग्रेस से जुडी रहीं। 1937 में दिल्ली कांग्रेस समिति की अध्यक्षा चुनी गईं पर कांग्रेस की कार्यशैली रास न आने के कारण उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। 1938 में हड़ताल में दुर्गा भाभी पुनःजेल गईं।

             बालक शचीन्द्र को योग्य शिक्षा देने की चाह में दुर्गा भाभी ने मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। सेवानिवृत्त के पश्चात् वे मृत्युपर्यंत अपने पुत्र शचीन्द्र के साथ गाजियाबाद में रहीं और शिक्षणकार्य करती रहीं। त्याग की परम्परा की संरक्षक दुर्गा भाभी ने लखनऊ छोडते समय अपना निवास-स्थल भी संस्थान को दान कर दिया। दुर्गा भाभी का देहान्त 92 वर्ष की आयु में 15 अक्टूबर सन् 1999 को हुआ।

              राष्ट के लिए समर्पित दुर्गा भाभी का सम्पूर्ण जीवन श्रद्धा-आदर्श-समर्पण के साथ-साथ क्रान्तिकारियों के उच्च आदर्शों और मानवता के लिए समर्पण को परिलक्षित करता है। वास्तव में दुर्गा भाभी भारत माता है| वोहरा दम्पत्ति जैसे क्रांतिकारियों ने अपना सर्वस्व हमारे राष्ट्र पर, हम पर न्योछावर करते हुए एक क्षण को भी कुछ विचारा नहीं। हमें यह अवश्य सोचना चाहिये कि हमने उन देशभक्तों के लिये, उनके सम्मान और सपनों के लिये, अपने देश के लिये अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है।

           महिला क्रांतिकारी दुर्गावती देवी की जयंती पर 'जन हितकारी संगठन' उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻
जय भारत🇮🇳


Monday, September 28, 2020

भगत सिंह



महान क्रांतिकारी भगत सिंह 🙏🏻
जयंती : 28 सितम्बर, 1907 💐💐
 
भगत सिंह  देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ अंग्रेजों का मुकाबला किया, वह आज के युवाओं के लिए एक आदर्श है। इन्होंने सेंट्रल असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया था। जिसके कारण इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया था।

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा गाँव (पाकिस्तान) में हुआ था, एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। भगतसिंह के पिता 'सरदार किशन सिंह' एवं उनके दो चाचा 'अजीतसिंह' तथा 'स्वर्णसिंह' अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ होने के कारण जेल में बन्द थे । जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया । इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गयी थी । भगतसिंह की दादी ने बच्चे का नाम 'भागां वाला' (अच्छे भाग्य वाला) रखा । बाद में उन्हें 'भगतसिंह' कहा जाने लगा । वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रान्तिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बन्धन में बाँधने की तैयारियाँ होने लगी तो वे लाहौर से भागकर कानपुर आ गये।

कानपुर में उन्हें श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का हार्दिक सहयोग भी प्राप्त हुआ। देश की स्वतंत्रता के लिए अखिल भारतीय स्तर पर क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन करने का श्रेय सरदार भगतसिंह को ही जाता है। उन्होंने कानपुर के 'प्रताप' में 'बलवंत सिंह' के नाम से तथा दिल्ली में 'अर्जुन' के सम्पादकीय विभाग में 'अर्जुन सिंह' के नाम से कुछ समय काम किया और अपने को 'नौजवान भारत सभा' से भी सम्बद्ध रखा।

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ । इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुंचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रध्दांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है।

1920 के महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगतसिंह ने स्कूल छोड़ दिया। असहयोग आंदोलन से प्रभावित छात्रों के लिए लाला लाजपत राय ने लाहौर में 'नेशनल कॉलेज' की स्थापना की थी। इसी कॉलेज में भगतसिंह ने भी प्रवेश लिया। 'पंजाब नेशनल कॉलेज' में उनकी देशभक्ति की भावना फलने-फूलने लगी। इसी कॉलेज में ही यशपाल, भगवतीचरण, सुखदेव, तीर्थराम, झण्डासिंह आदि क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ। कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब भी था। इसी क्लब के माध्यम से भगतसिंह ने देशभक्तिपूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया। ये नाटक थे - 1.   राणा प्रताप 2.   भारत-दुर्दशा 3.   सम्राट चन्द्रगुप्त

वे 'चन्द्रशेखर आज़ाद' जैस महान क्रान्तिकारी के सम्पर्क में आये और बाद में उनके प्रगाढ़ मित्र बन गये। 1928 में 'सांडर्स हत्याकाण्ड' के वे प्रमुख नायक थे। 8 अप्रैल, 1929 को ऐतिहासिक 'असेम्बली बमकाण्ड' के भी वे प्रमुख अभियुक्त माने गये थे। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल भी की थी। वास्तव में इतिहास का एक अध्याय ही भगतसिंह के साहस, शौर्य, दृढ़ सकंल्प और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है।

विचार-विमर्श के पश्चात यह निर्णय हुआ कि इस सारे कार्य को भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु अंजाम देंगे। पंजाब के बेटों ने लाजपत राय के ख़ून का बदला ख़ून से ले लिया। सांडर्स और उसके कुछ साथी गोलियों से भून दिए गए। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में पब्लिक 'सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी। शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए।

गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।

भगत सिंह और उनके साथियों पर 'लाहौर षडयंत्र' का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फांसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। 'लाहौर षड़यंत्र' के मुक़दमें में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली। भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहां पहुंचे, जहां इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियां पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।

महान_क्रांतिकारी भगत सिंह जी की जयंती पर जन_हितकारी_संगठन उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻

जय भारत🇮🇳

Thursday, September 10, 2020

जतीन्द्रनाथ मुखर्जी / बाघा जतीन



महान क्रांतिकारी 
जतीन्द्रनाथ मुखर्जी / बाघा जतिन 
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बलिदान दिवस: 10 सितम्बर, 1915 💐💐

         जतिंद्रनाथ मुखर्जी प्यार से 'बाघा जतिन' के रूप में याद किये जाते है। भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुख्य बंगाली क्रांतिकारियों में से थे। एक बहुत छोटी उम्र से, बाघा जतिन ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और युगांतर राजनीतिक दल के मुख्य नेता थे। युगान्तर पार्टी बंगाल में क्रान्तिकारियों का प्रमुख संगठन थी। चार्ल्स ऑगस्टस तेगार्ट, भारत में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी ने मशहूर टिप्पणी की है कि “बंगाली क्रांतिकारी निस्वार्थ राजनैतिक कार्यकर्ताओं की एक नस्ल के हैं और बाघा जतिन एक शानदार उदाहरण थे।”

         जतिंद्रनाथ मुखर्जी का जन्म नदिया (जैसोर) जिले के कुश्तिया उपखंड के कायाग्राम में 7 दिसम्बर 1879 में हुआ था। पांच वर्ष कि अल्पायु में उनके पिता का देहांत हो गया। माँ ने बड़ी कठिनाई से उनका लालन-पालन किया। वह बचपन से ही बड़े बलिष्ठ थे। सत्यकथा है कि एक बार जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक बाघ (रॉयल बेन्गाल टाईगर) से हो गयी। उन्होंने बाघ को अपने हसिये से मार गिराया था। इस घटना के बाद जतिन्द्रनाथ “बाघा जतीन” के नाम से विख्यात हो गए थे।

         18 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली। अपने कॉलेज के वर्षों के दौरान जतिन्द्रनाथ स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आये जिनके सामाजिक और राजनीतिक विचारों को बाद में जतीन ने प्रेरणा के रूप में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने के लिए उपयोग किया। बाघा जतीन की धर्मार्थ की भावना ने उन्हें प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़ और महामारी की पीड़ा के लिए राहत गतिविधियों को शुरू करने के लिए मदद की। ब्रिटिश भारत के औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली से नाखुश, जतिन्द्रनाथ ने 1899 में अपनी पढ़ाई छोड़ दी।

          जतिन्द्रनाथ 1900 में अनुशीलन समिति के संस्थापकों में से एक थे। अनुशीलन समिति ने ब्रिटिश सरकार के समर्थकों और अधिकारियों को मारने की दिशा में काम किया। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखने के लिए उन्होंने अपने कई क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर देवघर और कलकत्ता के मानिकतला क्षेत्र में बम कारखानों की स्थापना की। वर्ष 1907 में बाघा जतीन दार्जिलिंग में तीन वर्ष की अवधि के लिए एक विशेष मिशन पर गए। उन्होंने दार्जिलिंग में अनुशीलन समिति की एक शाखा खोली और नाम दिया बंधब समिति।

          बाघा जतीन ने बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में क्रांतिकारियों की विभिन्न शाखाओं के बीच मजबूत संपर्क स्थापित किया। यह वह समय था जब वरिष्ठ नेताओं के सलाखों के पीछे जाने के बाद बाघा जतीन अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल क्रांति के नए नेता के रूप में उभरे। वह बंगाल में उग्रवादी क्रांतिकारी नीति शुरू करने के लिए उत्तरदायी थे। बाघा जतीन को 27 जनवरी 1910 को गिरफ्तार किया गया था हालांकि वह कुछ दिनों के बाद छोड़ दिए गए थे।

          जेल से अपनी रिहाई के बाद, वह 'अनुशीलन समिति' के सक्रिय सदस्य बन गए और 'युगान्तर' का कार्य संभालने लगे। उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था कि “पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रान्तिकारियों का लक्ष्य है। देशी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवन यापन का अवसर देना हमारी मांग है।” बाघा जतीन ने अपने राजनीतिक विचारों से एक नए युग की शुरूआत की। बाघा जतीन की राजनीति में वापसी इतनी प्रभावशाली रही कि क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने बनारस से कलकत्ता स्थानांतरित होकर बाघा जतीन के नेतृत्व में काम करना स्वीकार किया।

         क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन सरकारी खजाने को लूटना था। इन लूटों में 'गार्डन रीच' की लूट बड़ी मशहूर मानी जाती है जिसके मुख्य नेता बाघा जतीन थे। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद, जतिन्द्रनाथ की युगांतर पार्टी ने बर्लिन समिति और जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जबकि भारतीयों की अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी योजनाओं को जर्मनी का समर्थन प्राप्त था, यह बाघा जतीन ही थे जिन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में समन्वय और नेतृत्व प्रदान किया था।

         हालांकि युगांतर और बाघा जतीन की गतिविधियों ने जल्द ही पुलिस अधिकारियों का ध्यान पकड़ा, जिससे बाघा जतीन अप्रैल 1915 में उड़ीसा में बालासोर जाने के लिए मजबूर हुए। जैसे ही जर्मनी के साथ बाघा जतीन की भागीदारी के बारे में ब्रिटिश अधिकारियों को पता चला, उन्होंने तत्काल कार्रवाई से गंगा के डेल्टा क्षेत्रों, उड़ीसा के चटगांव और नोआखली तटीय क्षेत्रों को सील कर दिया। बाघा जतीन के ठिकाने की खोज करने के लिए पुलिस खुफिया विभाग की एक इकाई को बालासोर भेजा था।

          न केवल ब्रिटिश बल्कि ग्रामीण भी बाघा जतीन और उनके साथियों की खोज में थे क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने 'पांच डाकुओं' के बारे में जानकारी देने वाले को इनाम देने की घोषणा की थी। अंत में 9 सितम्बर 1915 को बाघा जतीन और उनके साथियों ने बालासोर में चाशाखंड क्षेत्र में एक पहाड़ी पर बारिश से बचने के लिए आश्रय लिया तभी पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। हालांकि चित्ताप्रिय और उनके साथियों ने बाघा जतीन से आग्रह किया वे उन्हें छोड़ कर चले जाए लेकिन जतीन ने अपने दोस्तों को खतरे में अकेला छोड़कर जाने से इनकार कर दिया।

          पांच क्रांतिकारियों जिनके पास माउजर, पिस्टल थी और आधुनिक राइफल से लैस पुलिस और सशस्त्र सेना के बीच 75 मिनट चली मुठभेड़ में अनगिनत लोग ब्रिटिश सरकार के घायल हो गए और क्रांतिकारियों में चित्ताप्रिय की मृत्यु हो गई। इसी बीच जतीन बाघा का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। जब गोला बारूद ख़त्म हो गया तो बाघा जतीन और उनके साथी पकडे गए। गिरफ्तारी देते वक्त बाघा जतीन ने कहा- ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं।’

          बाघा जतिन को बालासोर अस्पताल ले जाया गया। इसके अगले दिन 10 सितम्बर 1915 को भारत की आज़ादी के इस महान क्रांतिकारी ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं। मातृभूमि के लिए उनका शौर्य और बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। बाघा जतिन के अन्तिम शब्द थे कि -

सूख न जाए कहीं पौधा ये आज़ादी का, खून से अपने इसे इसलिए तर करते हैं।

दर-ओ-दीवार पर हसरत से नजर करते हैं,

खुश रहो अहल-ए-वतनहम तो सफ़र करते हैं।।

महान क्रांतिकारी जतिंद्रनाथ मुखर्जी के बलिदान दिवस पर "जन हितकारी संगठन" उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻

जय भारत🇮🇳

कर्तार सिंह सराभा

  महान क्रांतिकारी #कर्तार_सिंह_सराभा जी🙏🏻🙏🏻 #जयंती: 24 मई,1896💐💐               कर्तार सिंह सराबा भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में...