Tuesday, October 27, 2020

जतिंद्र नाथ दास जी


जतिन्द्र नाथ दास स्वतंत्रता से पहले अनशन(उपवास) से शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए जेल में अपने प्राण त्याग दिए और शहादत पाई। इन्हें 'जतिन दास' के नाम से भी जाना जाता है, जबकि संगी साथी इन्हें प्यार से 'जतिन दा' कहा करते थे।जतिन दास का नाम देश के बड़े अनशन सत्याग्रही के रूप में लिया जाता है| लाहौर जेल में 63 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहने के बाद जतिन दास की मौत के सदमे ने पूरे देश को हिला दिया था|

जतिन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), में हुआ था। उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था। जतिन्द्रनाथजब नौ वर्ष के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। 16 वर्ष की उम्र में 1920 में जतिन दास ने मैट्रिक की परीक्षा पास की।जब जतिन्द्रनाथअपनी आगे की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे तभी वे बंगाल में एक क्रान्तिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति’ में शामिल हो गये|

युवावस्था से ही उनके अन्दर देश को अंग्रेजों से आज़ाद कराने की आग धधक रही थी| उन्होंने 1921 में असहयोग आन्दोलन में भाग लिया| विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए वे गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें 6 महीने की सज़ा हुई। लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो निराश जतिन्द्रनाथफिर कॉलेज में भर्ती हो गए। कॉलेज का यह प्रवेश जतिन्द्रनाथके जीवन में निर्णायक सिद्ध हुआ।

एक युवा क्रान्तिकारी के माध्यम से जतिन्द्रनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सचिंद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संस्था 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गये। अपने सम्पर्कों और साहसपूर्ण कार्यों से उन्होंने दल में महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया और अनेक क्रान्तिकारी कार्यों में भाग लिया।

नवम्बर 1925 में जतिन्द्रनाथ को 'दक्षिणेश्वर बम कांड' और 'काकोरी कांड' के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया, किन्तु प्रमाणों के अभाव में मुकदमा न चल पाने पर वे नज़रबन्द कर लिये गए। जेल में जतिन्द्रनाथने कैदियों पर हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठायी और भूख हड़ताल पर चले गये|जतिन्द्रनाथकी भूख हड़ताल का जेल प्रशासन पर इतना प्रभाव पड़ा कि जेल अधीक्षक ने 20 दिनों के बाद ही माफ़ी मांगी तो ही जतिन्द्रनाथने अपना अनशन समाप्त किया और जेल अधीक्षक को उन्हें रिहा करना पड़ा। यह जतिन्द्रनाथ की दृढ़ इच्छा शक्ति की जीत थी|

जेल से बाहर आने पर जतिन्द्रनाथ ने अपना अध्ययन और क्रान्तिकारी गतिविधियों दोनों को जारी रखा। 1928 की 'कोलकाता कांग्रेस' में वे 'कांग्रेस सेवादल' में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक थे। वहीं उनकी भगत सिंह से भेंट हुई और उनके अनुरोध पर बम बनाने के लिए आगराआ गए। 8 अप्रैल1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके, वे इन्हीं के द्वारा बनाये हुए थे। 14 जून,1929 को जतिन्द्रनाथ को क्रान्तिकारी गतिविधियोंके लिये गिरफ़्तार कर लाहौर जेल में कैद कर लिया गया और उन पर 'लाहौर षड़यंत्र केस' के तहत मुकदमा चला।

 लाहौर जेल में जतिन्द्रनाथ ने अन्य क्रान्तिकारी साथियों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी| उन्होंने भारतीय कैदियों और विचाराधीन कैदियों के लिए समानता की मांग की| भारतीय कैदियों के लिए वहां सब दुखदायी था| जेल प्रशासन द्वारा उपलब्ध करायी गई वर्दियां कई-कई दिनों तक नहीं धुलती थी| रसोई क्षेत्र और भोजन चूहों और तिलचट्टों से भरा रहता था| कोई भी पठनीय सामग्री जैसे अखबार या लिखने के लिए कोई कागज इत्यादि नहीं दिया जाता था जबकि एक ही जेल में अंग्रेज कैदियों को सारी सुविधायें मिल रही थी|

जेल में जतिन्द्रनाथ की भूख हड़ताल अवैध नजरबंदियों के खिलाफ प्रतिरोध में एक महत्वपूर्ण कदम था| उनकाकहना था कि एक बार अनशन आरम्भ होने पर हम अपनी मांगों की पूर्ति के बिना उसे नहीं तोड़ेंगे। कुछ समय के बाद जेल अधिकारियों ने नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों को जबरन कुछ खिलाने की कोशिश की, उन्हें मारा-पीटा गया|जतिन्द्रनाथ को 20दिन के पहले अपने अनशन का अनुभव था। उनके साथ यह युक्ति काम नहीं आई। नाक से डाली नली को सांस से खींचकर वे दांतों से दबा लेते थे।

अन्त में पागल खाने के एक डॉक्टर ने एक नाक की नली दांतों से दब जाने पर दूसरी नाक से नली डाल दी, जो जतिन्द्रनाथ के फेफड़ों में चली गई। उनकी घुटती सांस से और लगातार 63 दिनों से कुछ नहीं खाने के कारण जतिन्द्रनाथको निमोनिया हो गया। कर्मचारियों ने उन्हें धोखे से बाहर ले जाना चाहा, लेकिन जतिन्द्रनाथ अपने साथियों से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए।उनकी यह यादगार भूख हड़ताल 13 जुलाई 1929 को शुरू हुई और 63 दिनों तक चली| जतिन्द्रनाथ 13 सितम्बर 1929 को मात्र 24 वर्ष की उम्र में ही शहीद हो गये और उनकी भूख हड़ताल (अनशन) अटूट रही|

दुर्गा भाभी ने अंतिम संस्कार के लिए उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कोलकता ले जाने की तयारी की और उनके पार्थिव शरीर को रेल द्वारा लाहौर से कोलकता ले जाया गया| उस सच्चे शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हजारों लोग रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों पर एकत्रित होकर सच्ची श्रद्धांजलि दे रहे थे| उनके अंतिम संस्कार के समय कोलकता में दो मील लम्बा जुलूस उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए खड़ा था|देश के बड़े अनशन सत्याग्रहीशहीद शिरोमणि जतिन्द्रनाथ दास के देश प्रेम और अनशन की पीड़ा का कोई सानी नहीं है| वह आज भी हमारे प्रेरणा स्त्रोत हैं|

जतिन्द्रनाथ दास जी की जयंती पर जन हितकारी संगठन उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻


जय भारत

 

1 comment:

  1. ऐसे महान क्रांतिकारी जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के विरोध में भगतसिंह और उन्हें अन्य साथियों के साथ अनशन
    रखा और उसी दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। ऐसे योद्धा को नमन

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