दुर्गावती देवी जिन्हें हम दुर्गा भाभी के नाम से जानते है भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को शहजादपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था | दुर्गावती देवी का विवाह क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा से हुआ था। नेशनल कालेज-लाहौर के विद्यार्थी भगवतीचरण क्रांतिभाव से भरे हुए थे ही, उनकी पत्नी दुर्गावती देवी भी आस-पास के क्रांतिकारी वातावरण के कारण उसी में रम गईं थी। 1925 में उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम शचीन्द्रनाथ रखा गया। जन-जागृति और शिक्षा के महत्व को समझने वाली दुर्गावती देवी ने खादी अपनाते हुए अपनी पढाई जारी रखी |
भगवती चरण बोहरा राय साहब के पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को चालीस हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया।
दुर्गा भाभी ने सन् 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता की। साण्डर्स वध के पश्चात् सुखदेव दुर्गा भाभी के पास आये। सुखदेव ने दुर्गा भाभी से 500 सौ रूपये की आर्थिक मदद ली तथा उनसे प्रश्न किया- आपको पार्टी के काम से एक आदमी के साथ जाना है, क्या आप जायेंगी? प्रत्युत्तर में हाँ मिला। सुखदेव ने कहा- आपके साथ छोटा बच्चा शची (शचीन्द्रनाथ) होगा, गोली भी चल सकती है। दुर्गा स्वरूप रूप धर दुर्गा भाभी ने कहा- “सुखदेव, मेरी परीक्षा मत लो। मैं केवल क्रान्तिकारी की पत्नी ही नहीं हूँ, मैं खुद भी क्रान्तिकारी हूँ। अब मेरे या मेरे बच्चे के प्राण क्रान्तिपथ पर जायें, मैं तैयार हूँ|"
दूसरे दिन 18 दिसम्बर 1928 को सुखदेव अंग्रेज़ अफ़सर साण्डर्स को मारने वाले भगत सिंह और राजगुरू को लेकर दुर्गा भाभी के घर आ गये। भगत सिंह ने (फैल्ट हैट ओढ़े, पतलून और ऊपर बढ़िया ओवरकोट, पैर में चमकते हुए काले बूट जूते पहने छ: फुटा गोरा-चिट्टा पंजाबी जवान, जो उच्च अधिकारी लग रहा था) शची को गोद में लिया, शची के कारण भगत सिंह का चेहरा छिपा था, पीछे दुर्गा भाभी बड़ी रूआब से ऊँची हील की सैण्डिल पहने, पर्स लटकाये तथा राजगुरू नौकर रूप में पीछे-पीछे स्टेशन पहुंचे। जो एक पुरानी-फटी दरी को लपेटकर साथ लिए थे, उनका सिर मुँडा हुआ था और शरीर पर पुराने कपड़े थे| भगत सिंह और दुर्गा भाभी कलकता मेल के प्रथम श्रेणी में तथा राजगुरू तृतीय श्रेणी के डिब्बे में चढ़ गये।
इस प्रकार भगत सिंह और राजगुरू को सकुशल लाहौर से निकालने का श्रेय दुर्गा भाभी को है कि किस चतुराई से पुलिस की आँखों में धूल झोंकर निकाल लाई थी, यह आजादी की लड़ाई के इतिहास का अनछुआ पृष्ठ है। कलकता पहुचने पर भगवतीचरण ने अपनी क्रान्तिकारी पत्नी दुर्गा की प्रशंसा की और उनके साथ विवाह-बन्धन में बँध जाने के लिए स्वयं को सराहा, वे दुर्गा की निर्भयता और देश के प्रति समर्पण-भाव पर मुग्ध हो गए थे। धन्य हैं ये वीरांगना। इनके अतिरिक्त भेष बदल बदल कर बम, पिस्तौल क्रांतिकारियों को दुर्गा भाभी अक्सर मुहैया कराती रहती थीं।
दुर्गा भाभी अपने पति बोहरा के साथ मिलकर क्रांतिकारियों की हर तरह से मदद करती थीं। मात्र 23 वर्ष की अवस्था में पति के शहीद हो जाने के बाद भी दुर्गा भाभी के साहस में कोई कमी नहीं आई। दुर्गा भाभी मृत्यु की सूचना का वज्रपात सहते हुए, अन्तिम दर्शन भी न कर पाने का दंश झेलते हुए भी धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति बनी रहीं। पति की मृत्योपरान्त उनको श्रद्धांजलि रूपेण वे दोगुने वेग से क्रांति कार्य को प्रेरित करने लगी। भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने को जाने लगे तो वीरांगना दुर्गा भाभी ने अपने बाह से खून निकाल कर तिलक लगाया और तब उन्हें विदा किया था।
दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। 9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने तत्कालीन बम्बई गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई।
समृद्ध परिवार की दुर्गा भाभी के लाहौर के तीनों घर तथा इलाहाबाद के दोनो घर जब्त हो चुके थे। पुलिस पीछे पडी थी। इस केस में उनके विरुद्ध वारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज़्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गयीं| 15 दिन के रिमाण्ड के पश्चात सबूतों के अभाव में दुर्गा भाभी को पुलिस को रिहा करना पड़ा। 1919 रेग्यूलेशन ऐक्ट के तहत तत्काल दुर्गा भाभी को कैद कर तीन वर्ष तक नजरबंद रखा गया और फिर लाहौर और दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई।
तीन वर्ष बाद पाबंदी हटने पर दुर्गा भाभी ने प्यारेलाल गल्र्स स्कूल-गाजियाबाद में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान क्षय रोग हो गया परन्तु दुर्गा भाभी समाज-सेवा करते हुए कांग्रेस से जुडी रहीं। 1937 में दिल्ली कांग्रेस समिति की अध्यक्षा चुनी गईं पर कांग्रेस की कार्यशैली रास न आने के कारण उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। 1938 में हड़ताल में दुर्गा भाभी पुनःजेल गईं।
बालक शचीन्द्र को योग्य शिक्षा देने की चाह में दुर्गा भाभी ने मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। सेवानिवृत्त के पश्चात् वे मृत्युपर्यंत अपने पुत्र शचीन्द्र के साथ गाजियाबाद में रहीं और शिक्षणकार्य करती रहीं। त्याग की परम्परा की संरक्षक दुर्गा भाभी ने लखनऊ छोडते समय अपना निवास-स्थल भी संस्थान को दान कर दिया। दुर्गा भाभी का देहान्त 92 वर्ष की आयु में 15 अक्टूबर सन् 1999 को हुआ।
राष्ट के लिए समर्पित दुर्गा भाभी का सम्पूर्ण जीवन श्रद्धा-आदर्श-समर्पण के साथ-साथ क्रान्तिकारियों के उच्च आदर्शों और मानवता के लिए समर्पण को परिलक्षित करता है। वास्तव में दुर्गा भाभी भारत माता है| वोहरा दम्पत्ति जैसे क्रांतिकारियों ने अपना सर्वस्व हमारे राष्ट्र पर, हम पर न्योछावर करते हुए एक क्षण को भी कुछ विचारा नहीं। हमें यह अवश्य सोचना चाहिये कि हमने उन देशभक्तों के लिये, उनके सम्मान और सपनों के लिये, अपने देश के लिये अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है।
महिला क्रांतिकारी दुर्गावती देवी की जयंती पर 'जन हितकारी संगठन' उन्हें कोटि कोटि नमन करता है 💐💐🙏🏻🙏🏻
जय भारत🇮🇳

चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह तथा राजगुरु को बचाने के लिए अपने बच्चे के प्राणों को दाव पर लगाने वाली हो साहसी महिला क्रांतिकारी दुर्गा भाभी को मै शत शत नमन करता हूं
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