Monday, January 11, 2021

सूर्य सेन

 

               सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। उन्होने ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। "चटगाँव आर्मरी (शस्त्रागार) रेड" के नायक सूर्य सेन ने अंग्रेज़ सरकार को सीधे चुनौती दी। अंग्रेज़ सरकार उनकी वीरता और साहस से इस प्रकार हिल गयी थी कि जब उन्हें पकड़ा गया, तो उन्हें ऐसी हृदय विदारक व अमानवीय यातनाएँ दी गईं, जिन्हें सुनकर ही इंसान के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अंग्रेजों ने सूर्य सेन को 12 जनवरी 1934 को मेदिनीपुर जेल में फांसी दे दी|

           क्रान्तिकारी सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 को चटगाँव, बंगाल में हुआ था। उनके पिता का नाम रामनिरंजन था, जो चटगाँव के ही नोअपारा इलाके में एक शिक्षक थे। सूर्य सेन जी की प्रारम्भिक शिक्षा चटगाँव में ही हुई। जब वह इंटरमीडिएट के विद्यार्थी थे, तभी अपने एक राष्ट्र प्रेमी शिक्षक की प्रेरणा से वह बंगाल की प्रमुख क्रांतिकारी संस्था ‘अनुशीलन समिति’ के सदस्य बन गए। आगे की शिक्षा के लिए जब वह बहरामपुर गये वहीँ उन्हें प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन "युगांतर" के बारे में पता चला और वह उससे अत्यधिक प्रभावित हुए।

                युवा सूर्य सेन के हृदय में स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना दिन-प्रतिदिन बलवती होती जा रही थी। इसीलिए वर्ष 1918 में चटगाँव वापस आकर उन्होंने स्थानीय स्तर पर युवाओं को संगठित करने के लिए "युगांतर पार्टी" की स्थापना की| अधिकतर लोग यह मानते थे कि तत्कालीन युवा वर्ग केवल हिंसात्मक संघर्ष ही करना चाहता था, जो कि पूर्णत: गलत था। स्वयं सूर्य सेन ने भी जहाँ एक और युवाओं को संगठित किया, वहीँ वह 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' जैसे अहिंसक दल के साथ भी जुड़े थे। वे 'भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस' की चटगाँव ज़िला कमेटी के अध्यक्ष भी चुने गए थे। अपने देश प्रेमी संगठन के कार्य के साथ ही साथ वह नंदनकानन के सरकारी स्कूल में शिक्षक भी नियुक्त हुए और यहीं से "मास्टर दा" के नाम से लोकप्रिय हो गए।

                वर्ष 1923 तक मास्टर दा ने चटगाँव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी। शहीद सूर्य सेन ने युवाओं को संगठित कर "भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना" नामक एक सेना बनायी। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों के दल में गणेश घोष, लोकनाथ बल, निर्मल सेन, अम्बिका चक्रवर्ती, नरेश राय, शशांक दत्त, अरधेंधू दस्तीदार, तारकेश्वर दस्तीदार, हरिगोपाल बल, अनंत सिंह, जीवन घोषाल और आनंद गुप्ता जैसे वीर युवक और प्रीतिलता व कल्पना दत्त जैसी वीर युवतियाँ भी थीं। यहाँ तक की एक चौदह वर्षीय किशोर सुबोध राय भी अपनी जान पर खेलने गया।

           भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना के गठन से पूरे बंगाल में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी| साम्राज्यवादी सरकार क्रूरतापूर्वक क्रांतिकारियों के दमन में लगी हुई थी। साधनहीन युवक एक ओर अपनी जान हथेली पर रखकर निरंकुश साम्राज्य से सीधे संघर्ष रहे थे तो वहीं दूसरी और उन्हें धन और हथियारों की कमी भी सदा बनी रहती थी| इसी कारण मास्टर सूर्य सेन ने सीमित संसाधनों को देखते हुए अंग्रेज सरकार से गुरिल्ला युद्ध करने का निश्चय किया और अनेक क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्हें पहली सफलता तब मिली, जब उन्होंने दिन-दहाड़े 23 दिसम्बर,1923 को चटगाँव में आसाम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा।

            सबसे बड़ी सफलता 'चटगाँव आर्मरी रेड' के रूप में मिली, जिसने अंग्रेज़ सरकार को झकझोर कर रख दिया। यह अंग्रेज सरकार को खुला सन्देश था की भारतीय युवा मन अब अपने प्राण देकर भी दासता की बेड़ियों को तोड़ देना चाहता है। पूर्व योजनानुसार 18 अप्रैल, 1930 को सैनिक वस्त्रों में दल के क्रान्तिकारी युवाओं ने गणेश घोष और लोकनाथ बल के नेतृत्व में दो दल बनाये। गणेश घोष के दल ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ जी के दल ने चटगाँव के सहायक सैनिक शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया। किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बंदूकें तो मिलीं, किंतु उनकी गोलियाँ नहीं मिल सकीं।

            क्रांतिकारियों ने टेलीफ़ोन और टेलीग्राफ़ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए| इस तरह चटगाँव से कुछ दिनों के लिए ब्रिटिश शासन ख़त्म हो गया। तत्पश्चात यह दल पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुआ, जहाँ मास्टर सूर्य सेन ने अपनी इस सेना से विधिवत सैन्य सलामी ली, राष्ट्रीय ध्‍वज फहराया और भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।

                इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। अंग्रेज़ पुलिस किसी भी हाल में सूर्य सेन को पकड़ना चाहती थी और हर जगह उनकी तलाश कर रही थी। ब्रिटिश सरकार ने सूर्य सेन पर दस हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया। जब सूर्य सेन पाटिया के पास एक विधवा स्त्री सावित्री देवी के यहाँ शरण ले रखी थी तभी कैप्टेन कैमरून ने पुलिस व सेना के साथ उस घर को घेर लिया। दोनों और से गोलीबारी हुई, जिसमें कैप्टेन कैमरून मारा गया और सूर्य सेन अपने साथियों के साथ इस बार भी सुरक्षित निकल गए।

                इतना दमन और कठिनाइयाँ भी इन क्रांतिकारी युवाओं को डिगा नहीं सकीं और जो क्रांतिकारी बच गए थे, उन्होंने दोबारा खुद को संगठित कर लिया और अपनी साहसिक घटनाओं द्वारा सरकार को छकाते रहे। सूर्य सेन सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते और अपनी पहचान छुपाने के लिए नए-नए वेश बनाते। न तो उनके खाने का ठिकाना था और न ही सोने का, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

           किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हीं का एक धोखेबाज साथी नेत्र सेन लालच अथवा ईर्ष्यावश अंग्रेज़ों से मिल गया और जब सूर्य सेन उसके घर में शरण लिए हुए थे तभी उसकी मुखबिरी पर 16 फ़रवरी,1933 को मास्टर दा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार भारत का महान नायक पकड़ा गया। नेत्र सेन की पत्नी अपने पति के इस दुष्कर्म पर इतनी अधिक दु:खी और लज्जित हुई कि जब उसके घर में उसी के सामने ही एक देशप्रेमी ने उसके पति की हत्या कर दी तो उसने कोई विरोध नहीं किया।

           यहाँ तक की जब पुलिस जाँच करने आई तो उसने निडरता से कहा- "तुम चाहो तो मेरी हत्या कर दो, किन्तु तब भी मैं अपने पति के हत्यारे का नाम नहीं बताऊँगी, क्योंकि मेरे पति ने सूर्य सेन जैसे भारत माता के सच्चे सपूत को धोखा दिया था, जिसे सभी प्रेम करते हैं और सम्मान देते हैं। ऐसा करके मेरे पति ने भारत माता का शीश शर्म से झुका दिया है।"

           ब्रिटिश सरकार ने सूर्य सेन पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की और 12 जनवरी,1934 को क्रान्तिकारी सूर्य सेन को फाँसी दे दी गयी| लेकिन फाँसी से पूर्व उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएँ दी गयीं कि रूह कांप जाती है| निर्दयतापूर्वक हथोड़े से उनके दांत तोड़ दिए गए, नाखून खींच लिए गए, हाथ-पैर तोड़ दिए गए और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींचकर फाँसी के तख्ते तक लाया गया। क्रूरता और अपमान की पराकाष्ठा यह थी की उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके 'बंगाल की खाड़ी' में फेंक दिया गया।

           सूर्य सेन जी ने 11 जनवरी को अपने एक मित्र को अंतिम पत्र लिखा था कि- "मृत्यु मेरा द्वार खटखटा रही है। मेरा मन अनंत की और बह रहा है। मेरे लिए यह वो पल है, जब मैं मृत्यु को अपने परम मित्र के रूप में अंगीकार करूँ। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूँ? सिर्फ़ एक चीज़ - मेरा स्वप्न, मेरा सुनहरा स्वप्न, स्वतंत्र भारत का स्वप्न। प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी।" अंतिम समय में भी उनकी आँखें स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देख रही थीं। ऐसे महान नायक हमेशा हमारे लिए प्रेरणा स्त्रोत रहेंगे।



Tuesday, January 5, 2021

बारीन्द्र कुमार घोष


महान क्रांतिकारी बारीन्द्र कुमार घोष जी

जयंती: 5 जनवरी, 1880

भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार तथा "युगांतर" के संस्थापकों में से एक थे। वह 'बारिन घोष' नाम से भी लोकप्रिय हैं। बंगाल में क्रांतिकारी विचारधारा को फ़ैलानेका श्रेय श्री बारीन्द्र और भूपेन्द्र नाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद जी के छोटे भाई) को ही जाता है। महान अध्यात्मवादी श्री अरविन्द घोष उनके बड़े भाई थे।न्म 5 जनवरी 1880 को लन्दन के पास क्रोयदन (croydon) नमक कसबे में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्नाधन घोष एक नामी चिकित्सक व प्रतिष्ठित जिला सर्जन थे जबकि उनकी माता देवी स्वर्णलता प्रसिद्ध समाज सुधारक व विद्वान राजनारायण बासु की पुत्री थीं। श्री अरविन्द, जो की पहले क्रन्तिकारी और फिर अध्यात्मवादी हो गए थे, उनके तीसरे बड़े भाई थे जबकि उनके दूसरे बड़े भाई श्री मनमोहन घोष अंग्रेजी साहित्य के विद्वान, कवि और कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज व ढाका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे।

1902 में बारीन्द्र कलकत्ता वापस आये और यतीन्द्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) के साथ मिलकर बंगाल में अनेक क्रांतिकारी समूहों को संगठित करना शुरू कर दिया।

ढाका अनुशीलन समिति 

कार्य की सहूलियत के लिए अनुशीलन समिति का दूसरा कार्यालय 1904 में ढाका में खोला गया। जिसका नेतृत्व पुल्लिन बिहारी दास और पी. मित्रा ने किया। ढाका में इसकी लगभग 500 शाखाएं थीं। इसके अधिकांश सदस्य स्कूल और कॉलेज के छात्र थे। सदस्यों को लाठी, तलवार और बन्दूक चलने ली ट्रेनिंग दी जाती थी, हालाँकि बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं।


वारींद्र घोष ने 1905 में क्रांति से सम्बंधित "भवानी मंदिर " नामक पहली किताब लिखी। इसमें "आनंद मठ " का भाव था और क्रांतिकारियों को सन्देश दिया गया था की वह स्वाधीनता पाने तक सन्यासी का जीवन बिताएं।

बारिन और बाघ जतिन ने पूरे बंगाल से अनेक युवा क्रांतिकारियों को खड़ा करने में निर्णायक भूमिका अदा की। क्रांतिकारियों ने कलकत्ता के मनिक्तुल्ला में " मनिक्तुल्ला समूह " बनाया। यह उनका एक गुप्त स्थान था जहाँ वे बम बनाते और हथियार इकठ्ठा करते थे।


30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफ्फुल चंकी ने किंग्स्फोर्ड की हत्या का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप पुलिस ने बहुत तेजी से क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी और दुर्भाग्य से 2 -मई-1908 को श्री बारिन घोष को भी उनके कई साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर " अलीपुर बम केस " चलाया गया और प्रारंभ में ही उन्हें म्रत्युदंड की सजा दे दी गयी परन्तु बाद में उसे आजीवन कारावास कर दिया गया। उन्हें अंदमान की भयावह सेल्युलर जेल में भेज दिया गया जहाँ वह 1920 तक केद रहे।18 अप्रैल 1959 को इस महान सेनानी का देहांत हो गया

Thursday, December 31, 2020

कृष्ण बल्लभ सहाय

 


महान क्रांतिकारी कृष्ण बल्लभ सहाय

जयंती: 31 दिसंबर, 1898

भारत के सुप्रसिद्ध राष्ट्रभक्त एवं क्रांतिकारी थे, जो बाद में पहले बिहार के राजस्व मंत्री और फिर संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री भी बने।. के बी. सहाय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े थे। वह 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक मुख्यमंत्री पद पर रहे।

कृष्ण बल्लभ का जन्म बिहार के पटना ज़िले में सेखपुर नामक गांव में 31 दिसम्बर, 1898 में हुआ था। वे एक मध्यवर्गीय कायस्थ परिवार में से थे। कृष्ण बल्लभ सहाय ने पटना और हजारी बाग से अपनी शिक्षा ग्रहण की। जब वे कानून की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तो उन्होंने उसे छोड़ दिया।

कृष्ण बल्लभ सहाय 1920 के असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए। सन 1923 में सहाय ने समाज पार्टी के मंत्री के रूप में बिहार विधान परिषद में प्रवेश किया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कृष्ण बल्लभ सहाय ने स्वामी सहजानंद द्वारा चलाए गये किसान आन्दोलन में सक्रिय रूप से सहयोग किया था।

Saturday, December 26, 2020

ऊधम सिंह जी

 

महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह जी 🙏🙏

जयंती: 26 दिसंबर,1899 💐💐
महान क्रान्तिकारी उधम सिंह का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के प्रमुख क्रान्तिकारी के रूप में अमर है। शहीद उधम सिंह ने आजीवन देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के तत्कालीन गर्वनर जनरल रहे माइकल ओ' ड्वायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया। और इस तरह हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
            उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधम सिंह की माता नारायण कौर और 1907 में उनके पिता तेहल सिंह का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। अनाथालय में उधम सिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
            उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था। 13 अप्रैल 1919 को घटित हुए जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। क्रांतिकारियों के खून में आग लग गई। आक्रोश की ज्वाला हर देशवासी के दिल में धधक उठी। वैसे राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई।
            उधम सिंह जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। उस समय वे इक्कठा हुई भीड़ को अनाथालय के साथियों के साथ पानी पिलाने का काम कर रहे थे। यह हत्याकाण्ड देखकर उनका खून भी खौल उठा और उन्होंने उसी समय जलियांवाला बाग की मिट्टी उठाई और अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में ले जाकर शपथ ली कि जब तक इस नरसंहार के असली गुनहगार को मौत की नींद नहीं सुला दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
            उधम सिंह ने इस हत्याकाण्ड का असली गुनहगार पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ' ड्वायर को माना, क्योंकि उसी के आदेश पर यह जनसंहार हुआ था। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की और क्रांतिकारियों से मजबूत संबंध बनाए। वे वर्ष 1927 में पुनः स्वदेश लौटे। यहाँ पर उन्होंने शहीद शिरोमणि भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों से मुलाकात की। स्वदेश लौटने के मात्र तीन माह बाद ही वे अवैध हथियारों और प्रतिबन्धित क्रांतिकारी साहित्य के साथ पुलिस की गिरफ्त में आ गए। उन्हें 5 वर्ष की कठोर कैद की सजा हुई।
             वर्ष 1931 में उधम सिंह जेल से रिहा हुए। पुलिस उन पर कड़ी नजर रख रही थी। उधम सिंह वर्ष 1933 में पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गए और कश्मीर जा पहुंचे। इसके बाद वे जर्मनी होते हुए इटली जा पहुंचे। इटली में कुछ माह के बाद फ़्रांस, स्विटजरलैण्ड और आस्ट्रिया होते हुए वर्ष 1934 में अपने मिशन को पूरा करने के लिए इंग्लैण्ड पहुंचने में कामयाब हो गए और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ' ड्वायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।
             उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ' ड्वायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
              बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ' ड्वायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह माइकल ओ' ड्वायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। शहीद शिरोमणि उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।
              4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस महान शहीद को इसी जेल के अहाते में दफना दिया गया। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में पंजाब के सुल्तानपुर लोधी के विधायक साधु सिंह थिण्ड के अथक प्रयासों के चलते ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। उनकीं अस्थियों को पूरे राजकीय सम्मान के साथ सतलुज में प्रवाहित किया गया। ऐसे महान क्रान्तिकारी हमेशा हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत रहेंगे।
महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह जी के बलिदान दिवस पर जन हितकारी संगठन उन्हें कोटि कोटि नमन करता है💐💐🙏🙏
जय भारत🇮🇳


कर्तार सिंह सराभा

  महान क्रांतिकारी #कर्तार_सिंह_सराभा जी🙏🏻🙏🏻 #जयंती: 24 मई,1896💐💐               कर्तार सिंह सराबा भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में...