Friday, February 26, 2021

संत रविदास जी



संत रविदास (रैदास) का जन्म काशी में हुआ था। उनकी माता का नाम कर्मा देवी तथा पिता का नाम संतोख दास था। चर्मकार कुल से होने के कारण जूते बनाने का अपना पैतृक व्यवसाय उन्होंने ह्रदय से अपनाया था। वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे। 
 
संत रविदास बचपन से ही परोपकारी और दयालु स्वभाव के थे। दूसरों की सहायता करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। खास कर साधु-संतों की सेवा और प्रभु स्मरण में वे विशेष ध्यान लगाते थे। 
 
एक दिन संत रैदास (‍रविदास) अपनी कुटिया में बैठे प्रभु का स्मरण करते हुए कार्य कर रहे थे, तभी एक ब्राह्मण रैदासजी की कुटिया पर आया और उन्हें सादर वंदन करके बोला कि मैं गंगाजी स्नान करने जा रहा था, सो रास्ते में आपके दर्शन करने चला आया।

रैदासजी ने कहा कि आप गंगा स्नान करने जा रहे हैं, यह एक मुद्रा है, इसे मेरी तरफ से गंगा मैया को दे देना। ब्राह्मण जब गंगाजी पहुंचा और स्नान करके जैसे रुपया गंगा में डालने को उद्यत हुआ तो गंगा नदी में से गंगा मैया ने जल में से अपना हाथ निकालकर वह रुपया ब्राह्मण से ले लिया तथा उसके बदले ब्राह्मण को एक सोने का कंगन दे दिया।

ब्राह्मण जब गंगा मैया का दिया कंगन लेकर लौट रहा था तो वह नगर के राजा से मिलने चला गया। ब्राह्मण को विचार आया कि यदि यह कंगन राजा को दे दिया जाए तो राजा बहुत प्रसन्न होगा। उसने वह कंगन राजा को भेंट कर दिया। राजा ने बहुत-सी मुद्राएं देकर उसकी झोली भर दी।

ब्राह्मण अपने घर चला गया। इधर राजा ने वह कंगन अपनी महारानी के हाथ में बहुत प्रेम से पहनाया तो महारानी बहुत खुश हुई और राजा से बोली कि कंगन तो बहुत सुंदर है, परंतु यह क्या एक ही कंगन, क्या आप बिल्कुल ऐसा ही एक और कंगन नहीं मंगा सकते हैं।
 
राजा ने कहा- प्रिये ऐसा ही एक और कंगन मैं तुम्हें शीघ्र मंगवा दूंगा। राजा से उसी ब्राह्मण को खबर भिजवाई कि जैसा कंगन मुझे भेंट किया था वैसा ही एक और कंगन मुझे तीन दिन में लाकर दो वरना राजा के दंड का पात्र बनना पड़ेगा। खबर सुनते ही ब्राह्मण के होश उड़ गए। वह पछताने लगा कि मैं व्यर्थ ही राजा के पास गया, दूसरा कंगन कहां से लाऊं? 
 
इसी ऊहापोह में डूबते-उतरते वह रैदासजी की कुटिया पर पहुंचा और उन्हें पूरा वृत्तांत बताया कि गंगाजी ने आपकी दी हुई मुद्रा स्वीकार करके मुझे एक सोने का कंगन दिया था, वह मैंने राजा को भेंट कर दिया। अब राजा ने मुझसे वैसा ही कंगन मांगा है, यदि मैंने तीन दिन में दूसरा कंगन नहीं दिया तो राजा मुझे कठोर दंड देगा रैदासजी बोले कि तुमने मुझे बताए बगैर राजा को कंगन भेंट कर दिया। इसका पछतावा मत करो। यदि कंगन तुम भी रख लेते तो मैं नाराज नहीं होता, न ही मैं अब तुमसे नाराज हूं।
 
रही दूसरे कंगन की बात तो मैं गंगा मैया से प्रार्थना करता हूं कि इस ब्राह्मण का मान-सम्मान तुम्हारे हाथ है। इसकी लाज रख देना। ऐसा कहने के उपरांत रैदासजी ने अपनी वह कठौती उठाई जिसमें वे चर्म गलाते थे। उसमें जल भरा हुआ था।
 
उन्होंने गंगा मैया का आह्वान कर अपनी कठौती से जल छिड़का तब गंगा मैया प्रकट हुई और रैदास जी के आग्रह पर उन्होंने एक और कड़ा ब्राह्मण को दे दिया। ब्राह्मण खुश होकर राजा को वह कंगन भेंट करने चला गया और रैदासजी ने अपने बड़प्पन का जरा भी अहसास ब्राह्मण को नहीं होने दिया। ऐसे थे महान संत रविदास। 
 
एक अन्य प्रसंग के अनुसार एक बार एक पर्व के अवसर पर उनके पड़ोस के लोग गंगा जी में स्नान के लिए जा रहे थे। 
 
रविदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी गंगा स्नान के लिए चलने का आग्रह किया। उन्होंने उत्तर दिया- गंगा स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किंतु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का वचन मैंने दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो मेरा वचन भंग होगा। ऐसे में गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहां लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? 
 
मन जो काम करने के लिए अंत:करण से तैयार हो, वही काम करना उचित है। अगर मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। माना जाता है कि इस प्रकार के उनके व्यवहार के बाद से ही यह कहावत प्रचलित हो गई कि- 'मन चंगा तो कठौती में गंगा।' 
 
संत रविदास की रचनाएं :- 
 
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
 
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, 
जाकी अंग-अंग बास समानी।
 
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, 
जैसे चितवत चंद चकोरा।
 
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, 
जाकी जोति बरै दिन राती।
 
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, 
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
 
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा, 
ऐसी भक्ति करै रैदासा।

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पूजा कहा चढ़ाऊं... 
 
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊं ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊं ॥टेक॥
 
थन तर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भंवर जल मीन बिगारी ॥1॥
 
मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
विष अमृत दोउ एक संगा ॥2॥
 
मन ही पूजा मन ही धूप ।
मन ही सेऊं सहज सरूप ॥3॥
 
पूजा अरचा न जानूं तेरी ।
कह रैदास कवन गति मोरी ॥4॥ 

चंद्रशेखर आजाद जी


 

चंद्रशेखर आज़ाद

         आज़ादी के दीवाने चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के निर्भय क्रांतिकारी थे। चंद्रशेखर आजाद जी का एक ही लक्ष्य था, भारत की आजादी। इस लक्ष्य के सामने उनके लिए और बाकी सारे मुद्दे गौण थे। व्यक्तिगत जीवन का तो उनके लिये कोई मोल ही नहीं था इस मामले में भारत की आजादी के लक्ष्य को पाने के लिये जीवन में सुख सुविधाओं की चिंता करने का तो उनके लिए प्रश्न ही नहीं उठता।

         चंद्रशेखर आजाद जी का जन्म ग्राम भावरा जिला अलीराजपुर, मध्य प्रदेश में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। उनके माता का नाम जगरानी देवी और पिता का नाम सीताराम था। वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहाँ एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने चंद्रशेखर को व्याकुल कर दिया तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी।

         सन 1921 में उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जहाँ उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को अपना निवास स्थान बताया। उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली। उन्हें नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उन पर पड़ते थे और उनकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वे ‘वन्देमातरम्‌' और ‘भारत माता की जय!' चिल्लाते थे। हर बेंत के साथ वे तब तक यही नारा लगाते रहे, जब तक वे बेहोश न हो गये। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।

         सन् 1922 में गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वे वहां क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी से मिले। चंद्रशेखर आजाद के समर्पण और निष्ठा की पहचान करने के बाद बिस्मिल जी ने आजाद को अपनी क्रान्तिकारी संस्था “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशनका सक्रिय सदस्य बना दिया।

         इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल जी के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। चंद्रशेखर आजाद देश भर में अनेक क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लिया और अनेक अभियानों का प्लान, निर्देशन और संचालन सफलता पूर्वक किया। उन्होंने रूस की बोल्शेविक क्रान्ति की तर्ज पर समाजवादी क्रान्ति का आह्वान किया। सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे।

         सन् 1927 में राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी के साथ 3 प्रमुख साथियों के बलिदान और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद जी ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इस सभा में यह तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को एक नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये।

         पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व संभाला और भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया कि- हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

           चंद्रशेखर आज़ाद जी भूमिगत हो ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध गतिविधियों का संचालन करने लगे। लाहौर में लाला लाजपत राय जी की मौत का बदला लेने के लिए साण्डर्स वध (1928) में भी चंद्रशेखर आजाद जी ने भगत सिंह का साथ दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद जी के ही सफल नेतृत्व में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया।  ब्रिटिश सरकार ने चंद्रशेखर आज़ाद को पकड़वाने के लिए तीस हजार रूपये के इनाम का एलान कर दिया अतः उन्होंने जीवित सरकार के हाथ न आने की घोषणा कर दी।

         चन्द्रशेखर आज़ाद जी ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की सजा कम कराने के लिए इलाहाबाद गये और 27 फ़रवरी 1931 को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। चंद्रशेखर आजाद जी ने जवाहरलाल नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिए जोर डालाजवाहरलाल नेहरू ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर जवाहरलाल नेहरू ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये।

         किसी बड़ी साजिस के तहत मुखबिर के संकेत पर पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद जी को अलफ्रेड पार्क में घेर लिया। उन्होंने अपने जेब से पिस्तौल निकाल कर गोलियां चलानी शुरू कर दीदोनों ओर से भयंकर गोलीबारी हुईलेकिन जब चंद्रशेखर के पास मात्र एक ही गोली शेष रह गई तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा। उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएँगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फाँसी दे सकेगी। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने उस आखरी गोली से खुद को मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी और ‘आजाद’ नाम सार्थक किया।

          पुलिस के अंदर चंद्रशेखर आजाद जी का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थीउनके शरीर पर गोली चला और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पड़ा। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस पार्क में उनका निधन हुआ था उसका नाम बाद में अलफ्रेड पार्क को परिवर्तित कर “चंद्रशेखर आज़ाद पार्क” रखा गया आजाद का जन्म स्थान भावरा अब 'आजाद नगर' के रूप में जाना जाता है।

          ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं। चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। चंद्रशेखर आजाद की शहादत को हिन्दुस्तान हमेशा याद रखेगा। चंद्रशेखर!  तुम गुलाम देश में आजाद हो जिए और हम आजाद देश में गुलाम हैं।


Thursday, January 28, 2021

लाला लाजपत राय जी


लाला लाजपत राय जन्म: 28 जनवरी 1865 - मृत्यु: 17 नवम्बर 1928भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है। इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल-बाल-पाल में से एक थे। सन् 1928 में इन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये और अन्ततः १७ नवम्बर सन् १९२८ को इनकी महान आत्मा ने पार्थिव देह त्याग दी।लाला लाजपत राय का जन्म पंजाब के मोगा जिले में 28 जनवरी 1865 को एक जैन परिवार में हुआ था। इन्होंने कुछ समय हरियाणा के रोहतक और हिसार शहरों में वकालत की। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया। लाला हंसराज एवं कल्याण चन्द्र दीक्षित के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया, लोग जिन्हें आजकल डीएवी स्कूल्स व कालेज के नाम से जानते है। लालाजी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा भी की थी। 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये। उस समय इन्होंने कहा था: "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।" और वही हुआ भी; लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया। 17 नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया।
लालाजी की मौत का बदला

लाला जी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आज़ादभगत सिंहराजगुरुसुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी पर जानलेवा लाठीचार्ज का बदला लेने का निर्णय किया। इन देशभक्तों ने अपने प्रिय नेता की हत्या के ठीक एक महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसम्बर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया। लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी की सजा सुनाई गई।

Friday, January 22, 2021

सुभाष चन्द्र बोस

          


          भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व करने वाले क्रान्तिकारी सुभाष चन्द्र बोस जिन्हें हम नेता जी के नाम से भी जानते हैं, भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी क्रान्तिकारी थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया|

          नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी सन् 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री जानकीनाथ बोस और माँ का नाम श्रीमति प्रभावती देवी था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। कटक के प्रोटेस्टेण्ट यूरोपियन स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया। कॉलेज के प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का सुभाष जी के मन पर अच्छा प्रभाव पड़ा। मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में सुभाष जी ने विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया था। सुभाष जी ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और 1919 में बी.ए. (आनर्स) की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की  कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान था।

          पिता की इच्छा थी कि सुभाष जी आईसीएस बनें किन्तु उनकी आयु को देखते हुए केवल एक ही बार में यह परीक्षा पास करनी थी। उन्होंने पिता से चौबीस घण्टे का समय यह सोचने के लिये माँगा ताकि वे परीक्षा देने या न देने पर कोई अन्तिम निर्णय ले सकें। सारी रात इसी असमंजस में वह जागते रहे कि क्या किया जाये। आखिर उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया और 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैण्ड चले गये। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था| परीक्षा की तैयारी के लिये लन्दन के किसी स्कूल में दाखिला न मिलने पर सुभाष जी ने किसी तरह किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राईपास (आनर्स) की परीक्षा का अध्ययन करने हेतु उन्हें प्रवेश मिल गया|इससे उनके रहने व खाने की समस्या हल हो गयी। हाल में एडमीशन लेना तो  बहाना था असली मकसद तो आईसीएस में पास होकर दिखाना था। इसलिए उन्होंने खूब पढ़ाई की और 1920 में सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

           इसके बाद सुभाष ने अपने बड़े भाई शरतचन्द्र बोस को पत्र लिखकर उनकी राय जाननी चाही कि उनके दिलो-दिमाग पर तो स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों ने कब्जा कर रक्खा है ऐसे में आईसीएस बनकर वह अंग्रेजों की गुलामी कैसे कर पायेंगे? सुभाष चन्द्र बोस ने 22 अप्रैल 1921 को भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा। एक पत्र देशवन्धु चित्तरंजन दास को लिखा। किन्तु अपनी माँ प्रभावती का यह पत्र मिलते ही कि, “पिता, परिवार के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे उन्हें अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व है।" सुभाष जून 1921 में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (आनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आये|

           सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। कोलकता के स्वतन्त्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर सुभाष जी दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। इसके बाद सुभाष कोलकाता आकर दासबाबू से मिले। उन दिनों गान्धी जी ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रखा था। दासबाबू इस आन्दोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाष इस आन्दोलन में सहभागी हो गये। सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया।

          1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अन्तर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अन्दर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिये कोलकता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्टी ने लड़कर जीता और दासबाबू कोलकता के महापौर बन गये। उन्होंने सुभाष जी को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाष जी ने अपने कार्यकाल में कोलकता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकता में सभी रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दिये गये। स्वतन्त्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वालों के परिवारजनों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी। बहुत जल्द ही सुभाष जी देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गये। सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे।

         1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब उसे काले झण्डे दिखाये गये। कोलकता में सुभाष जी ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। 26 जनवरी 1931 को कोलकता में राष्ट्र ध्वज फहराकर सुभाष जी एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे तभी पुलिस ने उन पर लाठी चलायी और उन्हें घायल कर जेल भेज दिया। अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष जी को कुल 11 बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 में छह महीने का कारावास हुआ। 1930 में सुभाष जी कारावास में ही थे कि चुनाव में उन्हें कोलकता का महापौर चुना गया। इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गयी। 1932 में सुभाष जी को फिर से कारावास हुआ। इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत फिर से खराब हो गयी। चिकित्सकों की सलाह पर सुभाष इस बार इलाज के लिये यूरोप जाने को राजी हो गये।

        सन् 1933 से लेकर 1936 तक सुभाष यूरोप में रहे। यूरोप में सुभाष ने अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपना कार्य बदस्तूर जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वलेरा सुभाष जी के अच्छे दोस्त बन गये। बाद में सुभाष जी यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाष जी ने मन्त्रणा की जिसे पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से प्रसिद्धि मिली| इस विश्लेषण में उन दोनों ने गांधी जी के नेतृत्व की जमकर निंदा की|

       सन् 1934 में जब सुभाष जी ऑस्ट्रिया में अपना इलाज कराने हेतु ठहरे हुए थे उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने हेतु एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई। उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात करा दी। सुभाष जी एमिली की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया। नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने सन् 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया।

       1938 में कांग्रेस का 51वाँ वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होना तय हुआ। इस अधिवेशन से पहले गान्धी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष जी को चुना। इस अधिवेशन में सुभाष जी का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। किसी भी भारतीय राजनीतिक व्यक्ति ने शायद ही इतना प्रभावी भाषण कभी दिया हो। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की। इसी दौरान यूरोप में  द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाष जी चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू कर दिया था परन्तु गान्धी जी इससे सहमत नहीं थे।

        1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया तब सुभाष जी चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो इस मामले में किसी दबाव के आगे बिल्कुल न झुके। ऐसा किसी दूसरे व्यक्ति के सामने न आने पर सुभाष जी ने स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा। लेकिन गान्धी जी उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गान्धी जी ने अध्यक्ष पद के लिये पट्टाभि सीतारमैया को चुना। कोई समझौता न हो पाने पर बहुत बरसों बाद कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के लिये चुनाव हुआ।

        सब समझते थे कि जब गान्धी जी ने पट्टाभि सीतारमैय्या का साथ दिया हैं तब वे चुनाव आसानी से जीत जायेंगे। लेकिन वास्तव में सुभाष जी को चुनाव में 1580 मत और सीतारमैय्या को 1377 मत मिले। गान्धी जी के विरोध के बावजूद सुभाष जी 203 मतों से चुनाव जीत गये। मगर चुनाव के नतीजे के साथ बात खत्म नहीं हुई। गान्धी जी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष जी के तरीकों से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। गाँधी जी के विरोध के चलते इस 'विद्रोही अध्यक्ष' ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी जी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

        अगले ही वर्ष जुलाई में कलकत्ता स्थित हालवेट स्तम्भ जो भारत की गुलामी का प्रतीक था सुभाष जी की यूथ ब्रिगेड ने रातोंरात वह स्तम्भ मिट्टी में मिला दिया। सुभाष जी के स्वयंसेवक उसकी नींव की एक-एक ईंट  एक-एक ईंट उखाड़ ले गये। यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी। इसके माध्यम से सुभाष ने यह सन्देश दिया था कि जैसे उन्होंने यह स्तम्भ धूल में मिला दिया है उसी तरह वे ब्रिटिश साम्राज्य की भी ईंट से ईंट बजा देंगे। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने सुभाष सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओं को कैद कर लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिये सुभाष ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। हालत खराब होते ही सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। मगर अंग्रेज सरकार यह भी नहीं चाहती थी कि सुभाष युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिये सरकार ने उन्हें उनके ही घर पर नजरबन्द करके बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया।

        नजरबन्दी से निकलने के लिये सुभाष ने एक योजना बनायी। 16 जनवरी 1941 को वे पुलिस के आखों में धूल झोंकते हुए न सिर्फ़ भारत से भागने में सफल रहे बल्कि कई देशों का चक्कर लगाते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे। बर्लिन में सुभाष सर्वप्रथम रिबेन ट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओं से मिले। उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतन्त्रता संगठन और आज़ाद हिन्द रेडियो की स्थापना की। इसी दौरान सुभाष नेताजी के नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मन्त्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये। आखिर 29 मई 1942 के दिन, सुभाष जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले।

         वह नौसेना की मदद से जापान पहुँचे | जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया। कई दिन पश्चात् नेताजी ने जापान की संसद (ायट) के सामने भाषण दिया।

        आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। पूर्वी एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण देकर वहाँ के स्थायी भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद देने का आवाहन किया। उन्होंने अपने आवाहन में यह सन्देश भी दिया - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा|"

         21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार ‘आजाद हिन्द सरकार’ बनायी जिसे जर्मनी, जापानफिलीपाइन, कोरियाचीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। 

        इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

       द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गये। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखायी नहीं दिये। नेताजी कहाँ लापता हो गये और उनका आगे क्या हुआ यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। कुछ लोग पूर्ण विश्वास के साथ कहते है कि फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे| नेताजी की मौत पर रहस्य इसलिए भी बरकरार है क्योंकि भारत सरकार के पास करीब 150 ऐसी फाइलें हैं जो उनकी मौत के कारण पर रोशनी डाल सकती हैं, लेकिन भारत में आई अब तक की कोई भी सरकार इनका खुलासा नहीं करती।

       नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाये गये मुकदमे ने नेताजी के यश में वर्णनातीत वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गये विधिवत दुष्प्रचार तथा तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सुभाष के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देनेवाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को सुभाषका नाम देने में गर्व का अनुभव करने लगीं। नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाये गये मुकदमे ने नेताजी के यश में वर्णनातीत वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गये विधिवत दुष्प्रचार तथा तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सुभाष के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देनेवाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को सुभाषका नाम देने में गर्व का अनुभव करने लगीं।

       आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो।

जहाँ स्वतन्त्रता से पूर्व विदेशी शासक नेताजी की सामर्थ्य से घबराते रहे, तो स्वतन्त्रता के उपरान्त देशी सत्ताधीश जनमानस पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के अमिट प्रभाव से घबराते रहे। नेताजी ने अपना पूरा जीवन इस देश के लिए कुर्बान कर दिया।

कर्तार सिंह सराभा

  महान क्रांतिकारी #कर्तार_सिंह_सराभा जी🙏🏻🙏🏻 #जयंती: 24 मई,1896💐💐               कर्तार सिंह सराबा भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में...